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यार बड़े पछताओगे…........

पियूष मिश्रा को तो हम सब जानते ही हैं , एक बेहतर अभिनेता , कलाकार और लेखक के तौर पर वो युवाओं में एक बहुत ही चहेते व्यक्तित्व हैं | इस कविता मे पियूष मिश्रा ने अपनी शराब की लत पर एक बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ लिखी हैं | हर एक इंसान जो शराबियत के दौर से गुजरा है उसके लिए यह कविता एक सफ़र जैसी लगती है | यह कविता पियूष की किताब कुछ इश्क किया कुछ काम किया से ली गयी है , और मैंने यह कविता YouTube पर सुनी थी , जो मैं आपके साथ साझा करने जा रहा हूँ | इसका शीर्षक है “Alcoholism” |


आदत जिसको समझे हो वो मर्ज कभी बन जाएगा

फिर मर्ज की आदत पड़ जाएगी अर्ज ना कुछ कर पाओगे

 

 गर तब्दीली की गुंजाइश ने साथ दिया तो ठीक सही

 पर उसने भी गर छोड़ दिया तो यार बड़े पछताओगे…

 

जो बून्द कही बोतल कि थी , तो सथ वही दो पल का था

पता नही वो दो पल के साथ कब सदि में बदल गया 

 

हम चुप बैठ के, सुन्न गुजरते लम्हे को न समझ सके

वो कब भीगी उन पलकों कि उन सुर्ख नमी में बदल गया


नींद न जाने कहाँ गयी उन सहमी सिकुड़ी रातों में  

हम सन्नाटे को चीख राख़ से भरा अन्धेर तकते थे 

 

फिर शिंहर शिंहर, काँप काँप के थाम कलेजा हाथों में

जिसको न वापस आना था वह राह हम तकते थे 

 

जिसको समझे  हो तुम मजाक , वो दर्द कभी बन जायेगा

फिर दर्द की आदत पड़ जाएगी अर्ज ना कुछ कर पाओगे 

 

गर तब्दीली की गुंजाइश ने साथ दिया तो ठीक सही

 पर उसने भी गर छोड़ दिया तो यार बड़े पछताओगे…

 

कट फट के हम बिखर चुके थे जब तुम आये थे भाई 

और सभी रास्ते गुजर चुके थे जब तुम आये थे भाई

 

वो दौर न तुमने देखा था वो किस्से न सुन पाए थे

जिस दौर की आंधी काली थी उस दौर के काले साये थे

 

उस दौर नशे में जेहन था , उस दौर नशे में  ये मन  था

उस दौर पेशाने गीली थी , उस दौर नशे में तन था

 

उस दौर में सपने डर लेते , उस दौर दोपहरी सन्नाटा

उस दौर सभी कुछ था भाई  और सच बोलो तो कुछ भी न था 

 

नर्म सुन्दर सुरिला नगमा , कडवी तर्ज़ कभी बन जायेगा

फिर तर्ज़ की आदत पड़ जाएगी अर्ज ना कुछ कर पाओगे

 

गर तब्दीली की गुंजाइश ने साथ दिया तो ठीक सही

पर उसने भी गर छोड़ दिया तो यार बड़े पछताओगे…

 

उस दौर से पहले दौर रहा जब साथ जिंदगी रहती थी  

वो दौर बड़ा पुरजोर रहा जब साथ बंदगी रहती थी 

 

जब साथ कहकहों का होता जब बात लतीफो कि होती 

और शाम महकते ख्वाबों की, और रात हसीनो की होती

 

जब कहे नाजनी बोलो साजन कोन पेहर को आंउ मैं

हुसन कहे कि तु मेरा , और तेरा हो जाऊं मैं  

 

बस मैं पागल न समझ सका किस ओर तरफ को जाना है

जाम ने खींचा और बोतल इतराई के तुझको आना है

 

मैं मैखाने की ओर चला ये भूल के पीछे क्या होगा

नन्हा बचपन सुन्न हिचकियाँ अटक अटक के जग उठा

 

की भरी जवानी कसक मार के चुप चुप कहीं बैठी रहती है

और ख़ामोशी से कहे न कुछ और नम आँखों से कहती है

 

उन सहमी सिसकी रातों को मैं कभी न समझ सका

पल्लू ठुंसी फफक-फफकती बातों में न अटक सका

 

कभी कबार का काम टूटा फर्श कभी बन जाएगा

फिर फर्श की आदत पद जाएगी अर्ज़ न कुछ कर पाओगे

 

गर तबदीली की ख्वाहिश ने साथ दिया तो ठीक सही

पर उसने भी अगर छोड़ दिया तो यार बड़ा पछताओगे

 

के पछतावे के आंसू भी मैं  साथ नहीं ला पाया था

जले पुलों की क्या कहूँ जो जला जला के आया था

 

वो बोले थे की देखो इसको जर्द सर्द इंसान है ये

एक जिंदादिल तबियत पर बैठा मुर्दा दिल हैवान है ये  

 

मैं शर्मसार तो क्या होता मैं शर्म जला के आया था

उस सुर्ख जाम को सुर्ख लार में नहला के आया था  

 

मैं आँख की लाली साथ लहू मदहोश कहीं पे रहता था

खूंखार चुटकुले तंज लतीफे बना बना के कहता था

 

ये दर्द को सहने का झूठा हमदर्द कभी बन जाएगा

हमदर्द की आदत पद जाएगी अर्ज़ न कुछ कर पाओगे

 

गर तबदीली की गुंजाईश ने साथ दिया तो ठीक सही

और उसने भी अगर छोड़ दिया तो यार बड़ा पछताओगे |


Image Sources- wideopencountry.com,advocate.com,sobernation.com,npr.org,fb.com


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