शायरों की दुनिया का एक बहुत ही ख़ास नाम है, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ | इनका जन्म 13 फ़रवरी 1911 को अविभाजित हिन्दुस्तान के सियालकोट, पंजाब (अब पाकिस्तान में) हुआ था |
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का एक बहुत याद की जाने वाला एक शेर जिसका शीर्षक है “कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया” जिसका जवाब पियूष मिश्रा ने लिखा था |
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ -
वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिक़ी करते थे
हम जीते-जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा
फिर आख़िर तंग आ कर हम ने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया
पियूष मिश्रा –
वो काम भला क्या काम हुआ
जिस काम का बोझा
सर पे हो
वो इश्क़ भला
क्या इश्क़ हुआ
जिस इश्क़ का
चर्चा घर पे हो…
वो काम भला क्या
काम हुआ
जो मटर सरीखा
हल्का हो
वो इश्क़ भला
क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना दूर
तहलका हो…
वो काम भला क्या
काम हुआ
जिसमें ना जान
रगड़ती हो
वो इश्क़ भला
क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना बात
बिगड़ती हो…
वो काम भला क्या
काम हुआ
जिसमें साला दिल
रो जाए
वो इश्क़ भला
क्या इश्क़ हुआ
जो आसानी से हो
जाए…
वो काम भला क्या
काम हुआ
जो मज़ा नहीं दे
व्हिस्की का
वो इश्क़ भला
क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना मौक़ा
सिसकी का…
वो काम भला क्या
काम हुआ
जिसकी ना शक्ल
इबादत हो
वो इश्क़ भला
क्या इश्क़ हुआ
जिसकी दरकार
इजाज़त हो…
वो काम भला क्या
काम हुआ
जो कहे ‘घूम और
ठग ले बे’
वो इश्क़ भला
क्या इश्क़ हुआ
जो कहे ‘चूम और
भग ले बे’…
वो काम भला क्या
काम हुआ
कि मज़दूरी का
धोखा हो
वो इश्क़ भला
क्या इश्क़ हुआ
जो मजबूरी का
मौक़ा हो…
वो काम भला क्या
काम हुआ
जिसमें ना ठसक
सिकंदर की
वो इश्क़ भला
क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना ठरक
हो अंदर की…
वो काम भला क्या
काम हुआ
जो कड़वी घूंट
सरीखा हो
वो इश्क़ भला
क्या इश्क़ हुआ
जिसमें सब कुछ
ही मीठा हो…
वो काम भला क्या
काम हुआ
जो लब की
मुस्कां खोता हो
वो इश्क़ भला
क्या इश्क़ हुआ
जो सबकी सुन के
होता हो…
वो काम भला क्या
काम हुआ
जो
‘वातानुकूलित’ हो बस
वो इश्क़ भला
क्या इश्क़ हुआ
जो ‘हांफ के कर
दे चित’ बस…
वो काम भला क्या
काम हुआ
जिसमें ना ढेर
पसीना हो
वो इश्क़ भला
क्या इश्क़ हुआ
जो ना भीगा ना
झीना हो…
वो काम भला क्या
काम हुआ
जिसमें ना लहू
महकता हो
वो इश्क़ भला
क्या इश्क़ हुआ
जो इक चुम्बन
में थकता हो…
वो काम भला क्या
काम हुआ
जिसमें अमरीका
बाप बने
वो इश्क़ भला
क्या इश्क़ हुआ
जो वियतनाम का
शाप बने…
वो काम भला क्या
काम हुआ
जो बिन लादेन को
भा जाए
वो इश्क़ भला
क्या इश्क़ हुआ
जो
चबा…’मुशर्रफ’ खा जाए…
वो काम भला क्या
काम हुआ
जिसमें संसद की
रंगरलियां
वो इश्क़ भला
क्या इश्क़ हुआ
जो रंगे गोधरा
की गलियां…
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